Monday, 22 June 2015

सम्प्रेषण


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     जन्म लेने के बाद बच्चा जब पहली बार रोता है तो यह समाज के साथ उसका पहला सम्प्रेषण होता है।
उसके बाद प्रत्येक क्षण और आजीवन सम्प्रेषण आदि के माध्यम से परस्पर सम्प्रेषण करते हैं।इसके लिए हम अपनी समस्त ज्ञानेन्द्रियों अर्थात आंख , कान , हाथ और शरीर के समस्त अंगों का प्रयोग करते हैं।

आपने अपनी पूरी तैयारी और बडे यत्न से पढाया फिर भी बच्चे कम समझ सके।
                यह समस्या हम सभी शिक्षकों के सामने आती ह। प्रत्येक शिक्षक यही प्रयत्न करता है कि जो कुछ वह पढा रहा है बच्चा उसको अधिक से अधिक समझ ले।
पढाने के बाद हम प्रायः मान लेते हैं कि इतने अच्छे शिक्षण के बाद तो बच्चा शत-प्रतिशत समझ गया होगा , लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता।
👉 क्या हमने कभी यह जानने का प्रयास किया है कि आखिर ऐसा क्यूँ होता है ?
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सम्प्रेषण का अभिप्राय
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            यदि एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को सूचना या जानकारी दी जाती है और दूसरा व्यक्ति समझ लेता है तो यह ' सम्प्रेषण ' कहराता है।

एक तरफा सम्प्रेषण
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हम तैयारी कर के कक्षा में पढाने जाते हैं और बडे यत्न से पढाते हैं परन्तु बच्चे न कोई प्रश्न करते हैं , न कोई उत्तर देते हैं , बस चुपचाप सुनते जाते हैं। बोलने वाले को ज्ञात नहीं हो पाता कि सुनने वाले ने उनकी बात समझी या नहीं।
इसमें हमारी भूमिका मुख्य है मगर बच्चे निष्क्रिय श्रोता हैं। यह एक तरफा ' सम्प्रेषण ' कहलाता है।
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        प्रभावी सम्प्रेषण
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  मान लीजिए एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को कोई सूचना देता है तथा दूसरे व्यक्ति द्वारा सूचना ग्रहण करने का संकेत प्रेषक को किसी प्रतिक्रिया द्वारा प्राप्त हो जाय तो वह प्रभावी सम्प्रेषण होता है।
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        सम्प्रेषण के तीन घटक
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1⃣  प्रेषक

2⃣ संदेश

3⃣ ग्राही

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         सम्प्रेषण की बाधाएं -
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⚫ शिक्षक की भाषा एवं उच्चारण

⚫ श्यामपट्ट लेख एवं वर्तनी सम्बन्धी दोष

⚫ बच्चों की रूचि एवं जिज्ञासा

⚫ अध्यापक की मुखमुद्रा एवं हावभाव

⚫ बच्चों से दूरी

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